चौरानवे
भारी मन से
हवा
मुस्कुराई है
नए वाहन पर
होकर सवार
रोशनी आई है!
तिरानवे
धुएँ का विष
साँसों में भर रहा है
संकल्प है मगर
जीवन का
एक दीपक
फिर भी
जल रहा है!
वानवे
ये लड़ियों के
सहोदर
दिये हैं
इनकी लौ में
अजनबी साया है
गाँव के पास से
गुुजरती नदी के जल में
एक प्रतिबिम्ब
छाया है
इक्यानवे
उखट गईं
सब रिश्तों की जड़ें
विचारों के प्लावन में
इस दीवाली
गले मिलूँगा
बस अपनी परछाईं से!
नब्बे
जलती प्लास्टिक की बूँदें
गिरती हैं
वदन के चर्म पर
अपनी अंतड़ियों को
घुटनों में छुपाये
धर रहा है कुम्हार
मलहम के फाये!
नवासी
बहुत
उदास है दीवाली
पराई रौशनी में नहाई है
जी मचलता है
उसे अपनों की
याद आई है!
अठासी
देखता रहा...
देखता रहा...
विद्युतावलियों का
रंगीन प्रकाश
और खो गया
नन्हें दीपक का
मृदुहास!
सतासी
प्रकाश तो बहाना था
रिश्तों के उल्लास का
अब रिश्ते तरसते हैं
प्रकाश की झलक को
दीपावली आती है
और
चली जाती है!
छियासी
इन लड़ियों की
जगमगाती रौशनी में
मन खिल रहा है
पर
धीमे-धीमे
देश जल रहा है!
पिचासी
हवा कराहती है
आकाश रोता है
दीपक
दोनों के
आँसू ढोता है
प्रकाश के आँगन में
अब
ऐसा ही होता है!
चौरासी
टूटे दिये
जुड़ जायें
और
भोले बाबा
विष
पचाएँ
तब कहीं
हम दीपावली मनाएँ!
तिरासी
हे कृष्ण!
तुम्हारी बंशी की
यह ध्वनि निराली है
आँखों में छाया धुआँ
और
हृदय में भीषण शोर
किन्तु दीवाली है!
बयासी
हाथों में फुलझड़ियाँ
और सामने
दीवारों पर
प्लास्टिक की विद्युतलड़ियाँ
निकल गया मध्य से
सूँ...ऽ..ऽ...ऽऽ
एक रॉकेट
करता हुआ आखेट!
इक्यासी
गन्ध-सुगन्ध है
रोशनी है
रंग है
यत्र-तत्र खनक है
मन में किन्तु कसक है
इस दीवाली की
यह एक झलक है!
अस्सी
बंजारे नाचें
अँधियारों में
सेठ-शाह
रोशन गलियारों में
किसकी दीवाली है
प्रश्न बड़ा तीखा है
कूचों में, दरबारों में!
उनासी
स्वादिष्ट बड़े पकवान
और मोहक हैं
दृश्य निराले
रोशन हैं घर
रंग-बिरंगी टँगी झालरें
घूम रहे हैं लेकिन
साये काले-काले!
भारी मन से
हवा
मुस्कुराई है
नए वाहन पर
होकर सवार
रोशनी आई है!
तिरानवे
धुएँ का विष
साँसों में भर रहा है
संकल्प है मगर
जीवन का
एक दीपक
फिर भी
जल रहा है!
वानवे
ये लड़ियों के
सहोदर
दिये हैं
इनकी लौ में
अजनबी साया है
गाँव के पास से
गुुजरती नदी के जल में
एक प्रतिबिम्ब
छाया है
इक्यानवे
उखट गईं
सब रिश्तों की जड़ें
विचारों के प्लावन में
इस दीवाली
गले मिलूँगा
बस अपनी परछाईं से!
नब्बे
जलती प्लास्टिक की बूँदें
गिरती हैं
वदन के चर्म पर
अपनी अंतड़ियों को
घुटनों में छुपाये
धर रहा है कुम्हार
मलहम के फाये!
नवासी
बहुत
उदास है दीवाली
पराई रौशनी में नहाई है
जी मचलता है
उसे अपनों की
याद आई है!
अठासी
देखता रहा...
देखता रहा...
विद्युतावलियों का
रंगीन प्रकाश
और खो गया
नन्हें दीपक का
मृदुहास!
सतासी
प्रकाश तो बहाना था
रिश्तों के उल्लास का
अब रिश्ते तरसते हैं
प्रकाश की झलक को
दीपावली आती है
और
चली जाती है!
![]() |
चित्र : गूगल से साभार |
इन लड़ियों की
जगमगाती रौशनी में
मन खिल रहा है
पर
धीमे-धीमे
देश जल रहा है!
पिचासी
हवा कराहती है
आकाश रोता है
दीपक
दोनों के
आँसू ढोता है
प्रकाश के आँगन में
अब
ऐसा ही होता है!
चौरासी
टूटे दिये
जुड़ जायें
और
भोले बाबा
विष
पचाएँ
तब कहीं
हम दीपावली मनाएँ!
तिरासी
हे कृष्ण!
तुम्हारी बंशी की
यह ध्वनि निराली है
आँखों में छाया धुआँ
और
हृदय में भीषण शोर
किन्तु दीवाली है!
बयासी
हाथों में फुलझड़ियाँ
और सामने
दीवारों पर
प्लास्टिक की विद्युतलड़ियाँ
निकल गया मध्य से
सूँ...ऽ..ऽ...ऽऽ
एक रॉकेट
करता हुआ आखेट!
इक्यासी
गन्ध-सुगन्ध है
रोशनी है
रंग है
यत्र-तत्र खनक है
मन में किन्तु कसक है
इस दीवाली की
यह एक झलक है!
अस्सी
बंजारे नाचें
अँधियारों में
सेठ-शाह
रोशन गलियारों में
किसकी दीवाली है
प्रश्न बड़ा तीखा है
कूचों में, दरबारों में!
उनासी
स्वादिष्ट बड़े पकवान
![]() |
चित्र : गूगल से साभार |
दृश्य निराले
रोशन हैं घर
रंग-बिरंगी टँगी झालरें
घूम रहे हैं लेकिन
साये काले-काले!
1 comment:
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (28-11-2017) को "मन वृद्ध नहीं होता" (चर्चा अंक-2801) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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