Saturday, February 27, 2016

कुछ और क्षणिकाएँ

पचहत्तर
आश्चर्यचकित हूँ 
जानकर कि
कवि लोग 
कविता भी लिखते हैं

मैं सोचता था
थक जाते होंगे बेचारे
पुरस्कार लेने
और लौटाने के बीच!

छिहत्तर
हमीं बनाते हैं
पालकियाँ
हमीं बनाते हैं 
मुकुट
क्यों नहीं बना पाते
कुछ अतिरिक्त
कान, नाक और आँखें?

इतना तय है
जब हम अपना कौशल बढ़ायेंगे
तभी अच्छे दिन आयेंगे!

सतत्तर
क्यों सहूँ
डूबना-उतराना
इस भँवर में
जानता हूँ जब
बटोरकर थोड़ी शक्ति
एक मछली-सी उछाल
तोड़ सकती है आसानी से
यह भंवर जाल!

अठत्तर
पानी
सिर से गुजर चुका है
कुत्तों के भौंकने का शोर
दिशाओं को निगल चुका है
मित्रो!
रोशनी की उम्मीद छोडो
जितना बढ़ा सकते हो
अपने नाखूनों को बढ़ाओ
और अंधेरों के जंगल में
घुस जाओ।

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-02-2016) को "हम देख-देख ललचाते हैं" (चर्चा अंक-2267) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'