Saturday, February 27, 2010

चार क्षणिकाएँ/ उमेश महादोषी


॥एक॥
मेरे हाथों की लकीरें
ब्लेड से छील देते हो
बार-बार
पर/खून की जिस बूँद से
बनती हैं हजारों-हजार लकीरें
तुम किस चीज़ से काटोगे
उस बूँद के टुकड़े!

॥दो॥
क्या खूब कहानी है
इस सिंघासन की
इस पर बैठने वाला/ हर राजा
हमारी/मुक्ति की
बात करता है
और/ इसके पाये
रखे रहते हैं--
हमारे सीनों पर

॥तीन॥
अम्मा की साँस में
समा गया है--
चूल्हे का धुआँ
खटिया पै पड़ी-पड़ी
वह/नर्क-सा भोगती हैं
क्या करें!
डॉक्टर जानता है/बस
टी बी और दमा

॥चार॥
झोटा रे झोटा
सुन भैंस के ढोटा
उनके भरे गुदाम/ लेकिन
तेरा अपना खाली कुठला

थोड़ी-सी अकल काम ले
अब तो मेरे भाई!
पकी फसल की मेंढ़ों पर
सींग उठाकर डट जा
****

4 comments:

बलराम अग्रवाल said...

बहुत अच्छी, जीवन से जुड़ी रचनाएँ हैं। बधाई स्वीकार करें।

VINEET UPADHYAYA said...

jindagi ke vastavik swarup ka chitran karti kavitayen

Dr. Suresh Pandey said...

Samaj ke birodhabhaso ko samte ay rachnay alag alag hote huae bhi ak duseri sa judi hai. Lagta aam adami (phalli chanika) Amma ( thasari chanika)ka bich ma singhasan ( Dusari Chanika) in sabka karan hai. Badhai ho apko blog par dekhkar ak sukhad Aschary ho rha hai.
Dhany bad
Suresh sapan

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 09 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!